मौनी अमावस्या पर घाटों पर उमड़ा आस्था का सैलाब, चुस्त-दुरूस्त रहा सुरक्षा व्यवस्था


जनसंदेश न्यूज
वाराणसी। मौनी अमवस्या पर वाराणसी में गंगा घाटों पर सुरक्षा व्यवस्था चुस्त दुरुस्त रही। सुबह से ही आस्थावानों का रेला घाट की ओर बढ़ा तो गंगा घाट पर हर हर महादेव और हर हर गंगे का घोष गूंज उठा। मठ मंदिरों में घंट घड़यिालों के गूंजने के साथ ही चहुंदिश आस्था का अपार रेला उजाला होते ही नजर आने लगा। मौनी आमवस्या पर गुरुवार को सुरक्षा व्यवस्था चुस्त है। घाटों के चप्पे चप्पे पर पुलिस व पैरा मिलिट्री फोर्स की तैनाती को गई है। अस्सी, भदैनी, शिवाला, दशाश्वमेध, राजेंद्र प्रसाद, ललिता, राजघाट सहित सभी घाटों पर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से लैस पुलिस कर्मी स्नानार्थियों को हिदायत दे रहे है। गंगा पार भी स्नानार्थियों की सुरक्षा के भरपूर उपाय किए गए हैं। जबकि घाटों की ओर जाने वाली सड़क पर वाहनों के आवागमन को प्रतिबंधित किया गया है।

माघ मास के स्नान पर्वों में अमावस्या यानी मौनी अमावस्‍या तिथि बेहद खास मानी जाती है। दिवस विशेष पर मौन रह कर स्नान का विधान है। इसका धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष इसे परलोक से जोड़ता है तो वैज्ञानिक पहलू लोक संवारता है। मनोविज्ञानियों के अनुसार एक दिन मौन रहने से मानव शरीर में पांच दिन की ऊर्जा संचित होती है। हालांकि इसका मापन अभी तक कैलोरी में संभव नहीं है, लेकिन इसका व्रती-साधक को भी आभास हो जाता है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय आयुर्वेद संकाय के काय चिकित्सा विभाग के प्रो. जेएस त्रिपाठी के मुताबिक एक दिन मौन व्रत रखने से मानव शरीर में पांच दिन की खपत बराबर ऊर्जा को बचाया जा सकता है। हालांकि ध्यान-चिंतन-मनन में ऊर्जा का क्षय होता है। ऐसे में तिथि विशेष पर मनुष्य पांच दिन की संचित ऊर्जा में से दो दिन के उपयोग बराबर हिस्सा मनोचिंतन और ईश्वर ध्यान में व्यतीत कर देता है।

काशी विद्वत परिषद के मंत्री डा. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार तिथि विशेष पर त्रिवेणी अथवा गंगा तट पर स्नान-दान का महत्व है। प्रातरू नित्यकर्म से निवृत्त होकर तिल, तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, वस्त्र का दान करना चाहिए। साधु, महात्मा तथा ब्राह्मणों के सेवन के लिए अग्नि प्रज्वलित करना चाहिए।

ज्योतिषाचार्य प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री के अनुसार अमावस्या में सूर्य एवं चंद्रमा एक राशि में आ जाते हैं । ज्योतिष शास्त्र सूर्य को आत्मा तथा चंद्रमा को अन्तरूकरण अर्थात मन, बुद्धि, चित्त और अहम के प्रतीक रूप में मानता है। माघमास भी तप का मास है। तप की पूर्णता मन, बुद्धि, चित्त, अहं के निर्मलता से होती है।

ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार मौन होना ही मुनित्व की प्राप्ति है। सूर्य-चंद्र रुपी आत्मा तथा अन्तरूकरण का जब एकत्व हो रहा हो तब मौन होकर स्नान-ध्यान जप-दान करने से तप की पूर्णता होती है। यही साधक एवं सिद्ध दोनों के लिए मौनी अमावस्या है।